दिल्ली उच्च न्यायालय ने बच्चों के यौन उत्पीड़न के मामलों में मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) बनाने के लिएबृहस्पतिवार को शहर की सरकार को तीन सप्ताह का समय दिया।
मुख्य न्यायाधीश सतीश चंद्र शर्मा की पीठ को दिल्ली के महिला एवं बाल विकास विभाग की ओर से पेश वकील ने बताया कि राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) और दिल्ली महिला आयोग जैसे हित धारकों से चर्चा चल रही है। महिला एवं बाल विकास विभाग, बाल सुरक्षा कानूनों को लागू कराने वाली नोडल एजेंसी है।
पीठ से वकील ने कहा, ‘‘हमें इसे अंतिम रूप देने के लिए तीन सप्ताह का समय चाहिए ताकि सभी पक्षों को सुनने के बाद इसे अंतिम रूप दिया जा सके।’’ इस पीठ में न्यायमूर्ति संजीव नरुला भी शामिल हैं।
अदालत एक जनहित याचिका (पीआईएल) पर सुनवाई कर रही थी, जिसे दिल्ली सरकार के निलंबित अधिकारी प्रेमोदय खाखा द्वारा कथित तौर पर एक नाबालिग लड़की के यौन उत्पीड़न के मामले और पीड़िता की पहचान सार्वजनिक करने के मामले का स्वत: संज्ञान लेने के बाद अदालत ने शुरू किया था।
पीठ ने रेखांकित किया कि सरकार ‘अब भी मंथन’ कर रही है। अदालत ने कहा, ‘‘जीएनसीटीडी ने विचार विमर्श को पूरा करने और एसओपी बनाने के लिए तीन सप्ताह का समय मांगा।
सरकार को तीन सप्ताह का समय दिया जाता है।’’
पीठ ने मौखिक आदेश में पुलिस से नाबालिग लड़की को सुनवाई के लिए अदालत आने पर सुरक्षा देने को कहा और मामले की अगली सुनवाई 10 नवंबर को सूचीबद्ध कर दी। अदालत ने 28 अगस्त को अधिकारियों को निर्देश दिया था कि वह सुनिश्चित करे कि पीड़िता की पहचान किसी भी हालत में जाहिर नहीं हो और उसे सुरक्षा एवं मुआवजा मिले।
पिछले महीने अदालत ने बाल पीड़ितों से जुड़े मामलों में एसओपी बनाने के लिए दिल्ली सरकार और बाल अधिकार निकायों सहित विभिन्न प्राधिकारियों से सुझाव देने को कहा था।