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मौसी के घर से नौ दिन बाद लौटे भगवान जगन्नाथ, रुठी लक्ष्मी को मनाकर देंगे भक्तों को दर्शन

ओडिशा के पुरी में 20 जून से भगवान जगन्नाथ की बहुप्रतीक्षित यात्रा का इंतजार किया जा रहा था, जो अब समाप्त हो चुकी है। इस यात्रा की शुरुआत आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि से हुई थी, जब भगवान अपने बहन सुभद्र और भाई बलदाऊ के साथ अपनी मौसी के घर जाते है, जो कि गुंडिचा मंदिर में है। इस दौरान ही रथ यात्रा निकाली जाती है।
 
कुछ दिन गुंडिचा मंदिर में रहने की परंपरा है। कुल नौ दिनों तक भगवान गुंडीचा मंदिर में रहते हैं जहां उनकी पूरी सेवा की जाती है और उन्हें तरह तरह का भोग लगाया जाता है। इसके बाद उनकी रथ यात्रा दोबारा आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मंदिर में लौटती है, जिसे बाहुड़ा कहा जाता है। इस पूरी रथयात्रा के दौरान कई तरह की परंपराओं का निर्वाह किया जाता है। दोबारा मंदिर में पहुंचने के बाद रथयात्रा का समापन होता है। इसके बाद एक और खास परंपरा होती है, जिसमें भगवान जगन्नाथ रूठी हुई लक्ष्मी को मनाते है। दरअसल जब रथयात्रा दोबारा अपने मंदिर में लौटती है तो भगवान अपने आसन में लौटते है। इस दौरान नील माधव मां लक्ष्मी के पास में विराजमान होते है और अपनी पत्नी को मनाते है।
 
हिंदू शास्त्रों के मुताबिक भगवान जगन्नाथ के लिए भी दरवाजे नहीं खोलती है। भगवान जगन्नाथ का रास्ता मां लक्ष्मी की दासियां रोकती है। वहीं भगवान के सेवक दासियों को हटाने की कोशिश करते हैं, जिसे निलाद्री बिजे संस्कार कहा जाता है। इसके बाद किसी तरह दोनों की सुलह होती है। भगवान को मां लक्ष्मी को मनाने के लिए उन्हें खास उपहार भी देना होता है जो कि रसगुल्ले होते है।
 
ऐसे हुई थी बाहुड़ा यात्रा
बता दें कि इससे पहले ‘जय जगन्नाथ’ के उद्घोष और झांझ-मंजीरों की थाप के बीच भगवान जगन्नाथ की शुभ रथ यात्रा अपने मंदिर लौटी है। इसे बाहुड़ा यात्रा’ (रथ की वापसी) कहा जाता है। इस दौरान गुंडिचा मंदिर (मौसी के घर से) भगवान बलभद्र, देवी सुभद्रा और भगवान जगन्नाथ अपने घर लौटते है। इस दौरान तीनों को धाड़ी पहांडी के जरिए उनके रथों पर विराजमान कर ले जाया जाता है। इन्हें श्रीमंदिर में उनके निवास स्थान पर ले जाया जाता है।
 
बता दें कि इस वर्ष रथ यात्रा की शुरुआत 20 जून से हुई थी। इस दौरान भगवान जगन्नाथ को भगवान बलभद्र, देवी सुभद्रा के साथ लगभग तीन किलोमीटर दूर श्री गुंडिचा मंदिर ले जाया गया था। तीनों मिलकर पूरे सात दिनों तक गुंडिचा मंदिर में रहते हैं। बता दें कि इसे भगवान बलभद्र, देवी सुभद्रा और भगवान जगन्नाथ का जन्मस्थान माना जाता है।

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