In many cases, the friend is worse than the foe in terms of trade…अर्थात व्यापार में कई दफा दुश्मन से ज्यादा खतरनाक दोस्त होते हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यही लाइन बोलकर टैरिफ अटैक की शुरुआत की। जिसकी आशंका लंबे समय से जताई जा रही थी। वो 2 अप्रैल को सच हो गया। 2 अप्रैल अमेरिका के और 3 अप्रैल भारत के जब ट्रंप ने रेसिप्रोकल टैरिफ का ऐलान किया। जो भी देश अमेरिका के साथ व्यापार कर रहे हैं उन पर ट्रंप ने एकमुश्त टैरिफ लगाया है। हालांकि कॉपर, फॉर्मा, सेमीकंडक्टर, गोल्ड, सिल्वर, एनर्जी और कुछ यूनिक मिनरल्स को इससे दायरे से बाहर रखा है। यानी जहां फायदा था उसके तारों को नहीं छेड़ा गया है। लेकिन इसकी मात्रा बहुत लिमिटेड है। टैरिफ लगने का स्केल कहीं ज्यादा बड़ा है। नहीं लगने का बहुत ही लिमिटेड हैं। टैरिफ की सबसे ज्यादा मार झेलने वालों में कुछ तो अमेरिका के शत्रु हैं। लेकिन ज्यादातर खुद को अमेरिका का जिगरी दोस्त मानते हैं, लेकिन आगे से शायद न मानें। ट्रंप ने ऐसी कोई गुंजाइश छोड़ी नहीं है। इसमें भारत भी शामिल है जिस पर 26 फीसदी टैरिफ लगाया गया है।
इसे भी पढ़ें: Trump को टैरिफ का आइडिया मिला कहां से? 40 साल पुरानी ट्रेड वॉर की कहानी, Reciprocal Tariffs कैलकुलेट करना का क्या है पूरा गणित
ट्रंप ने किस पर कितना टैरिफ लगाया
व्हाइट हाउस के दस्तावेजों के मुताविक, भारत पर 27% शुल्क लगेगा। भारत पर 10% का आधारभूत शुल्क 5 अप्रैल से और अतिरिक्त 27 प्रतिशत शुल्क 9 अप्रैल से प्रभावी होगा। यह 27% शुल्क अमेरिका में प्रवेश करने वाले भारतीय उत्पादों पर अभी लागू किसी ने शुल्क के अतिरिक्त होगा। अमेरिका के टैरिफ के जवाब में कनाडा ने उस पर 25% ऑटो टैरिफ लगाया। भारत सरकार ने कहा कि अमेरिका के जवावी टैरिफ से पड़ने वाले असर का आकलन किया जा रहा है। उठाए जा सकने वाले कदमों के वारे में सभी संबंधित पक्षों से विचार किया जा रहा है। कॉमर्स मिनिस्ट्री ने कहा, हम इंडस्ट्री सभी संबंधित पक्षों से टैरिफ के असर पर राय ले रहे हैं।
रेसिप्रोकल टैरिफ की जो परिभाषा दी क्या वो लागू भी किया
प्रेसिडेंट ट्रंप की ओर से रेसिप्रोकल टैरिफ की जो परिभाषा दी गई है। उसके अनुसार दूसरे देशों पर इस बार टैरिफ नहीं लगा है। इसी वजह से जानकार मानते हैं कि ट्रंप की थ्योरी में कुछ झोल है। टैरिफ कैलकुलेट करने का तरीका कुछ अजीब है। असल में राष्ट्रपति ट्रंप की ओर से साफ किया गया था कि अमेरिका दूसरे देशों के आयात पर उतना ही टैरिफ लगाएगा जितना वो देश अमेरिका के आयात पर लगाएंगे। लेकिन अभी जो टैरिफ लगाए गए हैं, वो इस कथन के विपरती नजर आ रहे हैं। ऐसे में अमेरिका के व्यापार प्रतिनिधि ने बयान में इतना कहा है कि रेसिप्रोकल टैरिफ इस तरीके से कैलकुलेट किया गया है, जिससे दूसरे देशओं के साथ चल रहे व्यापारिक घाटे को पाटा जा सके। अब यह जो परिभाषा दी जा रही है, असल में तो इसे रेसिप्रोकल टैरिफ की व्याख्या नहीं कहा जा सकता। अगर अमेरिका को रेसिप्रोकल टैरिफ ही लगाना होता तो वो उतना टैरिफ दूसरे देश पर लगाता जितना उस पर लग रहा होता। लेकिन यहां तो सिर्फ व्यापारिक घाटे को पाटने की कोशिश हो रही है।
इसे भी पढ़ें: 1991 में दिवालिया होने का खतरा मंडराया, 1998 के पोखरण के बाद सबने प्रतिबंध लगाया, हर मुश्किलों को किया पार, ट्रंप का टैरिफ आपदा नहीं अवसर लाया इस बार
इस गणना में क्या गलत है?
घरेलू स्तर पर व्यापार घाटे की आलोचना करना और यह सवाल उठाना राजनीतिक रूप से समझदारी भरा हो सकता है कि अगर यह उचित है तो दो देशों के बीच व्यापार को संतुलित क्यों नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन यह समझना जरूरी है कि कुछ देशों के साथ ट्रेड डेफिसिट में चला जाता है तो कुछ देशों के साथ सरप्लस में। जबकि टैरिफ, गैर-टैरिफ बाधाएं और मुद्रा हेरफेर अंततः व्यापार घाटे या सरप्लसस में योगदान करते हैं, टैरिफ अकेले घाटे को हल नहीं कर सकते हैं और न ही सभी घाटे दो देशों के बीच व्यापार के अनुचित होने का सबूत हैं। उदाहरण के लिए, मुख्य रूप से चावल खाने वाले देश के लिए ऐसे देश से बहुत ज़्यादा आयात करना संभव नहीं है जो मुख्य रूप से गेहूं का उत्पादन और निर्यात करता है, भले ही टैरिफ़ का स्तर कुछ भी हो। ऐसा इसलिए है क्योंकि चावल खाने वाले देश में गेहूं की पर्याप्त मांग नहीं होगी। हां अगर वही देश अगर खेती से जुड़ी कोई मशीन कहीं से आयात करेगा, तब उस देश के साथ उसका ट्रेड डेफिसिट होगा, जानते हैं क्यों- क्योंकि चावल वाले देश में उन मशीन की जरूरत तो काफी होगी, लेकिन वहां वो प्रड्यूज ही नहीं होतीं। अगर ट्रंप की नजर से रेसिप्रोकल टैरिफ को समझें तो वे आने वाले दिनों में भारत पर और ज्यादा टैरिफ लगा सकते हैं, वो भी इसलिए क्योंकि उन्हें ट्रेड डेफिसिट खत्म करना है, उन्हें समान टैरिफ लगाने से कोई मतलब नहीं है।